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आईजीयू में एक दिवसीय राष्ट्रीय विधि सम्मेलन का आयोजन।

Published on: 31 Jan 2026

*आईजीयू में एक दिवसीय राष्ट्रीय विधि सम्मेलन का आयोजन।*


इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय, मीरपुर, रेवाड़ी के विधि विभाग द्वारा “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार एवं उसकी सीमाएँ” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय विधि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर असीम मिगलानी ने की एवं कुलसचिव प्रोफेसर दिलबाग सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

सम्मेलन के मुख्य अतिथि प्रोफेसर देविंदर सिंह, कुलपति, डॉ. बी. आर. आंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, सोनीपत रहे। विशिष्ट अतिथि प्रो. कविता ढुल, महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक तथा मुख्य वक्ता प्रो. भारत, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ रहे।

सम्मेलन में प्रो. सुनीत के. श्रीवास्तव (IGNOU, दिल्ली), प्रो. अशोक कुमार (CDLU, सिरसा) एवं प्रो. धरम पाल सिंह पुनिया (केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा) ने संसाधन व्यक्ति के रूप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं उसकी संवैधानिक सीमाओं पर विचार प्रस्तुत किए।

राष्ट्रीय विधि सम्मेलन का मंच संचालन सचिव डॉ. कुसुम यादव द्वारा किया गया।

राष्ट्रीय सम्मेलन के संयोजक डॉ. हेमंत कुमार यादव ने सम्मेलन के उद्देश्य एवं उसकी उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला। सम्मेलन के संचालक प्रोफेसर तेज सिंह ने आए हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, संसाधन व्यक्तियों तथा विश्वविद्यालय के कुलपति एवं कुलसचिव का धन्यवाद ज्ञापित किया।

उक्त सम्मेलन में पूरे भारत से गुणवत्तापूर्ण 180 शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। सम्मेलन में सारगर्भित विवेचना के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे, भारतीय संविधान के विकसित होते परिदृश्य में एक समयोचित एवं बौद्धिक रूप से महत्वपूर्ण पहल रही। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत प्रदत्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राणवायु है, किंतु यह अधिकार पूर्ण एवं निरंकुश नहीं है। इस संगोष्ठी में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक उत्तरदायित्व के मध्य संतुलन पर गहन विमर्श किया गया।

सम्मेलन के दौरान संवैधानिक विश्लेषण, न्यायिक व्याख्याओं तथा समकालीन विमर्शों—विशेषतः डिजिटल एवं मीडिया-प्रधान युग के संदर्भ में—के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत लगाए गए युक्तिसंगत प्रतिबंध किस प्रकार संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं न्याय प्रशासन की रक्षा करते हैं। घृणास्पद भाषण, फेक न्यूज़, मीडिया ट्रायल, मानहानि, न्यायालय की अवमानना तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के नियमन जैसे विषयों ने विधायिका, न्यायपालिका और समाज के समक्ष उपस्थित समकालीन चुनौतियों को रेखांकित किया।

विचार-विमर्श में यह बात प्रमुख रूप से उभरकर आई कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तकनीकी प्रगति के साथ विकसित होना चाहिए, किंतु उसे संवैधानिक मूल्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। तुलनात्मक एवं अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोणों ने भी संगोष्ठी को समृद्ध किया, जिससे यह समझ विकसित हुई कि विश्व की विभिन्न लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ समान चुनौतियों से किस प्रकार निपटती हैं।

समग्र रूप से यह सम्मेलन, इस तथ्य को पुनः स्थापित करने में सफल रही कि अभिव्यक्ति का अधिकार मात्र एक कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व है, जिसके साथ सजगता, संयम एवं जवाबदेही आवश्यक है। इस राष्ट्रीय मंच के माध्यम से विधि विभाग ने विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं एवं आमजन के मध्य सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करते हुए समकालीन भारत में संवैधानिक स्वतंत्रताओं पर चल रही चर्चा में अहम योगदान दिया। कार्यक्रम की सफलता में संकाय सदस्यों की सक्रिय सहभागिता रही, डॉ. अदिति शर्मा, डॉ. सुशांत यादव, डॉ. ईश्वर शर्मा, डॉ. बीरेंद्र सिंह , डॉ. मंजू पुरी, डॉ. नवनीत कौशल, डॉ. पूनम रानी, डॉ. अनीता, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. बलजीत यादव, श्रीमती स्मृति, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ. संदीप, डॉ. मनीष, डॉ. सुमित, डॉ. अविनाश आर्य, डॉ. संदीप कुमार, डॉ. जागीर नागर, डॉ. संगीता, डॉ. अनिल वर्मा, डॉ. अनिल डागर तथा कार्यालय सहायक श्री चंद्रशेखर, श्रीमती रीना और सुख सहायक प्यारेलाल, अरुण और पवन का विशेष योगदान रहा।